डिजिटल सुविधा तभी सफल होती है जब विश्वास बचे। एमडीआर लागत छुपाकर ग्राहक से वसूलना नैतिक नहीं।
नीति दिल्ली में बने, असर भीलवाड़ा की दुकान पर दिखे—इसीलिए स्थानीय व्याख्या जरूरी है। बैंक सरल भाषा में समझाएँ; व्यापारी रसीद साफ रखें।
भय फैलाना भी गलत है, अनदेखी करना भी। जागरूकता ही सही मध्य मार्ग है।
केसरी जागरूकता का पक्षधर है, आतंक का नहीं। पंद्रह अक्टूबर से पहले संवाद बढ़ाएँ।
नैतिक बाजार लंबी दूरी का दौड़ होता है—आज का छोटा फैसला कल की साख तय करता है।
— भीलवाड़ा केसरी डेस्क
विनोद नरनिवाल
संपादक, भीलवाड़ा केसरी