पारदर्शिता सामाजिक कार्य की आत्मा है। जाँच हो, पर पूर्वाग्रह न हो। अदालत फैसला करे; सोशल मीडिया कोर्ट न बने।
ईमानदार एनजीओ डरें नहीं, नियम तोड़ने वाले जवाब दें। आरोप सिद्ध होने तक अनुमान अनुचित है।
केसरी प्रक्रिया सम्मान का पक्षधर है। नागरिक समाज और नियामक दोनों को एक ही कसौटी—सत्य और कानून—माननी चाहिए।
पारदर्शिता दंड नहीं, विश्वास की भाषा है। दस्तावेज़ साफ हों तो जाँच भी सहज होती है।
भीलवाड़ा समेत छोटे शहरों के स्वयंसेवी काम को अफवाह से नहीं, प्रक्रिया से परखा जाए।
— भीलवाड़ा केसरी डेस्क
विनोद नरनिवाल
संपादक, भीलवाड़ा केसरी